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अर्थव्यवस्था से संबद्ध सैंटियागो सहमति | Santiago Consensus on Economy

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इस सहमति को भी वॉशिंगटन सहमति के एक विकल्प के रूप में देखा जाता है। इसका प्रस्ताव सैंटियागो शहर में विश्व बैंक समूह के वर्तमान अध्यक्ष 'जेम्स वोल्फेन्सोन' ने दिया था। यह प्रस्ताव विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए सुझाया गया था। इसका मूल उद्देश्य समावेश है, जो सामाजिक तथा आर्थिक दोनों ही स्वरूपों में सुनिश्चित हो। इस प्रकार यह तय है कि इस सामाजिक आर्थिक विकास मॉडल की स्थानीय विशेषताएँ होंगी। इस दृष्टिकोण से बीजिंग सहमति की तरह ही इसमें सामाजिक व्यंजनाएँ होंगी।

This consent is also seen as a substitute for the Washington consent. It was proposed by the current President of the World Bank Group 'James Wolfenson' in the city of Santiago. This proposal was suggested for developing economies. Its basic objective is inclusion, which is assured in both social and economic terms. Thus it is certain that this socioeconomic development model will have local characteristics. From this point of view it will have the same social euphemisms as the Beijing Consensus.

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विकास के इस मॉडल को साकार रूप देने हेतु विश्व बैंक ने आर्थिक सहायता दी। इसके अतिरिक्त सूचना तकनीक की अपार शक्ति के प्रयोग पर बल दिया। आगे चलकर विश्व बैंक ने कहा कि वैश्वीकरण के माध्यम से विश्व में बढ़ती मुक्तता तथा साझेदारी में ज्ञान को विस्तृत करना है तथा इसे सभी के लिए उपलब्ध बनाना है। इस क्षेत्र में कार्य करते हुए विश्व बैंक ने 'ज्ञान बैंक' की आंतरिक संरचना का भी विकास किया।

The World Bank gave financial assistance to realize this model of development. Apart from this, emphasis was given on the use of immense power of information technology. Later on the World Bank said that through globalization the increasing freedom and sharing of knowledge in the world has to be done and to make it available to all. Working in this area, the World Bank also developed the internal structure of 'Knowledge Bank'.

इस प्रस्ताव ने विश्व की सरकारों को सामाजिक तथा आर्थिक समावेश पर बल देने की ओर प्रेरित किया। वर्ष 2002 में भारत सरकार भी इससे प्रेरित हुई। इससे भारत में तीसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों को प्रारंभ किया गया। इससे आर्थिक सुधारों के लाभ आम लोगों तक पहुँच गये।

This proposal inspired the governments of the world to emphasize on social and economic inclusion. In the year 2002, the Government of India was also inspired by this. This marked the beginning of third generation economic reforms in India. Due to this the benefits of economic reforms reached the common people.

पूंजीवाद संवृद्धि प्रोत्साहन का साधन-
सन् 1929 की 'महान मंदी' ने पूंजीवाद को एक असफल आर्थिक व्यवस्था साबित किया। परिणामस्वरूप मिश्रित अर्थव्यवस्था का आगमन हुआ। इसके बाद के वर्षों में विश्व के देशों की मिश्रित अर्थव्यवस्थाओं पर पूंजीवादी विचारधारा का उच्च प्रभाव पड़ता रहा। सन् 1985 के बाद वाशिंगटन विकल्प के रूप में सहमति एवं 1995 के बाद वैश्वीकरण व विश्व व्यापार संगठन इसके दो सबसे जीवंत उदाहरण हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि विकसित देशों में व्याप्त महान रिशेसन इन सभी देशों की नीतियों में आयी उच्च पूंजीवादी एवं नव-उदारवादी रुझान का फल है। अतः इस प्रकार अब तक विश्व के समक्ष पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के विध्वंसक प्रभावों के से दो उदाहरण मौजूद हैं।

Capitalism a tool of growth promotion-
The 'Great Depression' of 1929 proved capitalism to be a failed economic system. This resulted in the advent of a mixed economy. In the years that followed, capitalist ideology continued to have a high impact on the mixed economies of the countries of the world. Consensus as Washington alternative after 1985 and globalization and WTO after 1995 are two of the most vivid examples of this. Experts say that the Great Depression prevailing in the developed countries is the result of the high capitalist and neo-liberal trends in the policies of all these countries. So there are thus far two examples of the destructive effects of capitalist economic policies before the world.

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आगे चलकर एक आम सहमति उभरी कि हालाँकि पूंजीवाद एक धारणीय आर्थिक व्यवस्था तो नहीं है किन्तु ऐसी नीतियाँ आर्थिक संवृद्धि तथा आय को प्रोत्साहित करने में सहायता कर सकती हैं। ईसी वजह से संसार के अधिकतर देशों की आर्थिक नीतियों में पूंजीवादी रुझान दिखता है। जबकि उन सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ मिश्रित प्रणाली की हैं। इन देशों में जहाँ एक ओर व्यवसाय अनुकूल नीतियों पर अमल किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर गरीब अनुकूल नीतियों को भी महत्व दिया गया है। भारत में भी वर्ष 2015-16 के संघीय बजट से इसी प्रकार के नीतिगत रुझान दिखाई देते हैं। इसे तत्कालीन वित्त मंत्री ने भी स्वीकार किया था। परिवर्तित हुई धारणा के कारण विशेषज्ञ पूंजीवाद को एक आर्थिक व्यवस्था के रूप में नहीं बल्कि संवृद्धि या वृद्धि को प्रोत्साहित करने का साधन मानते हैं।

At later a general consensus emerged that although capitalism is not a sustainable economic system, such policies can help stimulate economic growth and income. Because of this, capitalist tendencies are visible in the economic policies of most countries of the world. Whereas the economies of all those countries are of mixed system. In these countries where business friendly policies are being implemented on the one hand. On the other hand, poor friendly policies have also been given importance. Similar policy trends are visible in India as well from the Union Budget 2015-16. This was also accepted by the then Finance Minister. Due to the changed perception, experts consider capitalism not as an economic system but as a means of promoting growth or growth.

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आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों / विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
R F Temre
rfcompetition.com



I hope the above information will be useful and important.
(आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।)
Thank you.
R F Temre
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