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आर्थिक सुधार से संबद्ध- वॉशिंगटन सहमति | Washington Consensus on Economic Reform

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आर्थिक सुधार से संबंधित जो सलाह थी। इस सलाह को विश्व के विकासशील देशों को आर्थिक संकट के समाधान हेतु विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमेरिकी ट्रेजरी विभाग या वित्त मंत्रालय ने सुझाया था। ये तीनों ही निकायों के मुख्यालय संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डी.सी. में स्थित हैं। अत: इसे अमेरिका के अर्थशास्त्री जॉन विलियम्सन द्वारा 'वॉशिंगटन सहमति' कहा गया।

This was advice related to economic reforms. This advice was suggested by World Bank, International Monetary Fund and US Treasury Department or Ministry of Finance to solve the economic crisis to the developing countries of the world. The headquarters of all these three bodies are located in the capital of United States of America Washington D.C.. Hence it was called the 'Washington Consensus' by the American economist John Williamson.

इसके अंतर्गत निम्न लिखित दस आर्थिक सुधार प्रस्तावित किये गए थे-
1. सार्वजनिक खर्च की प्राथमिकताओं को उन क्षेत्रों की ओर पुनर्निर्देशित किया गया जिनसे उच्च लाभ तथा आय के वितरण की अधिक संभावना हो। उदाहरण के लिए प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना।
2. इसके अंतर्गत वित्तीय अनुशासन भी सम्मिलित की गई है।
3. अर्थ से संबद्ध ब्याज दर में उदारीकरण
4. कर में सुधार किया गया। सीमांत दरों में कमी एवं कराधार को बड़ा किया गया।
5. व्यापार में उदारीकरण किया गया।
6. प्रतिस्पर्धी विनिमय दरों के प्रयोग का आरंभ किया गया।
7. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अंतःप्रवाह में उदारीकरण किया गया।
8. विनियमन किया गया। यह कार्य प्रवेश और विकास में बाधाओं को दूर करने के अर्थ में किया गया।
9. निजीकरण प्रारंभ हुआ।
10. संपत्ति अधिकारों कौ सुरक्षित किया गया।

The following ten economic reforms were proposed under this-
1. Public spending priorities were redirected to areas with higher potential for higher returns and distribution of income. For example primary education, primary health and infrastructure.
2. Financial discipline has also been included under this.
3. Liberalization of interest rate linked to the meaning
4. Tax reforms carried out. Marginal rates were reduced and the tax base was enlarged.
5. Liberalization was done in trade.
6. The use of competitive exchange rates was introduced.
7. Inflow of FDI was liberalized.
8. Regulated. This was done in the sense of removing barriers to entry and development.
9. Privatization started.
10. Who protected the property rights.

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आगे चलकर यह शब्दावली लातिन अमेरिका में 'नव-उदारवाद', 1998 की जॉर्ज सोरोस की अवधारणा के अनुसार 'बाजारवादी रूढ़िवाद' तथा समस्त संसार में 'भूमंडलीकरण' की समर्थक हो गयी। यह ऐसे अति विश्वास तथा अंधी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करने के लिए भी प्रयुक्त हुई जिससे कि बाजार कैसी भी स्थिति संभाला जा सकता है।

This terminology was later adopted in Latin America as 'neo-liberalism', a 1998 concept by George Soros 'marketist conservatism' and became a supporter of 'Globalization' all over the world. It is also used to denote overconfidence and blind commitment to handling any market situation.

लेकिन वास्तविक स्थिति भिन्न रही है। बीसवीं सदी के अस्सी तथा नब्बे के दशकों के में भी इन नीतियों की अनुशंसा विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यू.एस. ट्रेजरी के साथ मिलकर करते आ रहे थे। ये उपाय तत्कालीन समय में लातिन अमेरिका के देशों की वास्तविक समस्याओं के हल हेतु सुझाए गए थे। आगे चलकर अन्यान्य परिस्थितियों में भी इनके प्रयोग की कोशिशों का विरोध उन लोगों द्वारा भी किया जो इनके प्रतिपादक थे।

But the actual situation has been different. Even in the eighties and nineties of the twentieth century, these policies were recommended by the World Bank and the International Monetary Fund. Been doing it together with the Treasury. These measures were suggested to solve the real problems of the countries of Latin America at that time. Later, attempts to use them in other circumstances were also opposed by those who were their exponents.

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वाशिंगटन-सहमति का हवाला देना विशेषकर जॉन विलियमसन के लिए मानो दुर्भाग्यपूर्ण ही लगता रहा है। जबकि जॉन विलियमसन इसके जनक रहे। उनके अनुसार दुनिया भर में प्रेक्षक यह मानते हैं कि वाशिंगटन सहमति का अभिप्राय ऐसी नव-उदारवादी नीतियों से है जो कि लाचार देशों के ऊपर वॉशिंगटन स्थित वित्तीय संस्थाओं ने थोपी हैं तथा जो उनके यहाँ संकट व दुर्दशा का कारण बनी हैं। इसके अंतर्गत ऐसे लोग भी हैं जो इस शब्दावली को क्रोध एवं घृणा के साथ ही उच्चारते हैं। विलियम्सन पुनः कहते हैं कि कई लोग यह समझते हैं कि जैसे इस सहमति दस्तावेज के बिन्दु उन नियमों का प्रतिपादन करते हैं जो संयुक्त राज्य अमेरिका विकासशील देशों पर जबरन लादना चाहता है। इसके बदले, विलियम्सन का हमेशा से यह मानना रहा है कि ये सभी अनुशंसाएँ या नुस्खे उन सहमतियों का प्रतिनिधित्व इसलिए करते हैं क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। इस योजना के अनेक प्रतिपादकों का कहना है कि इनके पीछे कोई सख्त नव-उदारवादी ऐजेंडा नहीं हो सकता है। जैसा कि मुक्त व्यापार के विरोधी कहते हैं या दावा करते हैं, बल्कि उन्हें इसे एक अनुदार मूल्यांकन के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए कि एक देश में आर्थिक स्थिरता किस प्रकार की नीतियों से संभव हो सकता है।

The citing of the Washington-Consent seems particularly unfortunate for John Williamson. While John Williamson was its father. According to him, observers around the world believe that the Washington Consensus refers to the neo-liberal policies that Washington-based financial institutions have imposed on the helpless countries and which have become a cause of distress and misery in them. There are also people under this who pronounce this terminology with anger and hatred. Williamson reiterates that many people understand that as the points of this agreement document the rules that the United States seeks to force on developing countries. Instead, Williamson has always held that all these recommendations or prescriptions represent those consensus because they are universal. Many exponents of this plan say that there cannot be any strict neo-liberal agenda behind them. As opponents of free trade say or claim, they should rather present it as a rough assessment of what policies make a country's economic stability possible.

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लेकिन हुआ यह कि इन नीतियों से उन प्रक्रियाओं का प्रारंभ हुआ जिन्हें निजीकरण, उदारीकरण तथा भूमंडलीकरण कहते हैं। आगे चलकर पूरी दुनिया में अर्थव्यवस्था में राज्य की भूमिका को सीमित कर दिया गया। उन देशों में कहीं अधिक, जो विश्व बैंक से विकास निधि प्राप्त कर रहे थे या जो भुगतान संतुलन संकट के समय अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से सहायता मांगने जाते रहे थे। उदाहरण के लिए 1991 में भारत में, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों पर आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई। यह सब कुछ इस प्रकार था मानो एडम स्मिथ के 'मुक्त व्यापार' अर्थात् उदारवाद के नुस्खे का पुनर्जन्म अर्थात् नव-उदारवाद हुआ हो।

But it happened that these policies started the processes which are called privatization, liberalization and globalization. Later on, the role of the state in the economy all over the world was limited. Even more so in countries that were receiving development funding from the World Bank or who had been seeking help from the International Monetary Fund during the balance of payments crisis. For example, in 1991 in India, economic reforms were initiated on the terms of the International Monetary Fund. It was all as if Adam Smith's idea of ​​'free trade' i.e. liberalism was reborn i.e. neo-liberalism.

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विशेषज्ञों के अनुसार सन् 2008 के अमेरिकी सब-प्राईम संकट एवं वॉशिंगटन तत्पश्चात् आने वाला पश्चिमी देशों का आर्थिक संकट अर्थात् महान रिसेशन की जड़ें वॉशिंगटन सहमति में विद्यमान थीं। पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में व्याप्त 'रिसेशन' के पश्चात् विश्व में वॉशिंगटन सहमति में विश्वास कम होता चला गया। इसकी जगह पर अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में 'राज्य हस्तक्षेप' का विचार बलवती हुआ है। इसे विश्व में विकास राज्य में विश्वास बढ़ने का संकेत माना जा रहा है।

According to experts, the American sub-prime crisis of 2008 and the economic crisis of Western countries that followed Washington, that is, the roots of the Great Recession, were present in the Washington Consensus. After the 'recession' that prevailed in Western economies, the trust in the Washington Consensus in the world went down. In its place the idea of ​​'state intervention' in the field of economy has flourished. This is being considered as a sign of increasing confidence in the development state in the world.

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आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों / विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
R F Temre
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R F Temre
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